माँ कूष्मांडा-ब्रह्मांड की उत्पत्ति करने वाली सूर्य के समान तेजस्वी देवी

नवरात्री के चौथे दिन माँ दुर्गा के चतुर्थ स्वरूप माँ कूष्मांडा की उपासना की जाती है। “कूष्मांडा” शब्द तीन शब्दों से मिलकर बना है — कू (छोटा), ष्म (ऊर्जा/गर्मी), और अंडा (ब्रह्मांड का अंडा)। अर्थात् जिन्होंने अपनी दिव्य हँसी से इस संपूर्ण ब्रह्मांड की रचना की, वही माँ कूष्मांडा हैं।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, सृष्टि की रचना से पूर्व जब चारों ओर केवल अंधकार था, तब माँ कूष्मांडा ने अपनी दिव्य मुस्कान से ब्रह्मांड को उत्पन्न किया। यही कारण है कि इन्हें आदिशक्ति और सृष्टि की आदि स्वरूपा भी कहा जाता है।

माँ कूष्मांडा सूर्यमंडल के भीतर निवास करती हैं। उनका तेज सूर्य के समान है और यही प्रकाश सम्पूर्ण जगत को प्रकाशित करता है।

ॐ देवी कूष्मांडायै नमः॥
या देवी सर्वभूतेषु शक्ति-रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

देवी का स्वरूप

🐯
वाहन : सिंह
🖐️
भुजाएं: अष्टभुजा (8 हाथ)
🎨
रंग: हरा (प्रिय रंग)
💛
फूल: पीले फूल, कमल
🍬
प्रिय भोग: मालपुआ, पेठा
🌞
निवास: सूर्यमंडल

माँ कूष्मांडा का स्वरूप अत्यंत दिव्य और तेजोमय है। इनके आठ हाथों में क्रमशः कमंडल, धनुष, बाण, कमल-पुष्प, अमृत कलश, चक्र, गदा, और जप माला धारण है। इनकी मंद मुस्कान से ब्रह्मांड में ऊर्जा का संचार होता है।

सुरासम्पूर्णकलशं रुधिराप्लुतमेव च।
दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्मांडा शुभदास्तु मे॥
— देवी कवच, मार्कंडेय पुराण

पौराणिक कथा

पुराणों में वर्णित है कि जब सृष्टि का अस्तित्व नहीं था, तब चारों दिशाओं में घोर अंधकार था। न सूर्य था, न चंद्रमा, न वायु, न जल। उस समय आदिशक्ति माँ कूष्मांडा ने अपने दिव्य स्वरूप में प्रकट होकर सृष्टि की रचना का संकल्प लिया।

माँ ने अपनी ईषत् (हल्की) मुस्कान के द्वारा ब्रह्मांड-अंड (कॉस्मिक एग) को जन्म दिया। इसी से पंचतत्व, तीनों लोक, देवी-देवता, नदियाँ, पर्वत — समस्त सृष्टि की उत्पत्ति हुई। तत्पश्चात माँ ने त्रिदेवों — ब्रह्मा, विष्णु, महेश — को उत्पन्न करके सृष्टि, पालन और संहार का कार्यभार सौंपा।

इसीलिए माँ कूष्मांडा को जगत की माता, आदिशक्ति और सृष्टिकर्त्री कहा जाता है।

पूजा विधि

नवरात्री की चतुर्थी को माँ कूष्मांडा की पूजा विधि-विधान से करने पर भक्त को यश, बल, आरोग्य और आयु की प्राप्ति होती है। पूजा करने का सही तरीका इस प्रकार है:

  1. ब्रह्म मुहूर्त में उठें — सूर्योदय से पूर्व स्नान करके शुद्ध वस्त्र (विशेषतः हरे या पीले रंग के) धारण करें।
  2. पूजा स्थल तैयार करें — माँ कूष्मांडा की मूर्ति या चित्र को साफ चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर स्थापित करें। दीपक प्रज्वलित करें।
  3. षोडशोपचार पूजन — गंध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदि से सोलह उपचार पूजा करें। हरे रंग के फूल और पीले पुष्प विशेष रूप से अर्पित करें।
  4. मालपुआ का भोग — माँ को मालपुआ अथवा पेठे का भोग लगाएं। यह उनका प्रिय प्रसाद है।
  5. मंत्र जप — “ॐ देवी कूष्मांडायै नमः॥” मंत्र का 108 बार माला पर जप करें।
  6. दुर्गा सप्तशती पाठ — यथासंभव देवी माहात्म्य का पाठ करें और आरती उतारें।
  7. कन्या पूजन — नौ कन्याओं या कम से कम एक कन्या को भोजन कराएं और दक्षिणा दें।

भोग और चढ़ावा

माँ कूष्मांडा को इन चीजों का भोग और चढ़ावा अत्यंत प्रिय है:

🍬 मालपुआ
🥜 पेठा मिठाई
🌼 पीले-हरे पुष्प
🪔 घी का दीपक
🌿 दूर्वा घास
🍯 शहद
🥛 पंचामृत
🌸 कमल पुष्प
🍌 फल

माँ को पेठा (कुम्हड़ा/सफेद कद्दू) विशेष रूप से प्रिय है — इसीलिए उनका नाम “कूष्मांडा” पड़ा, क्योंकि संस्कृत में पेठे को “कूष्मांड” कहते हैं।

माँ की कृपा से मिलने वाले वरदान

माँ कूष्मांडा की सच्चे मन से आराधना करने वाले भक्तों को निम्नलिखित फल प्राप्त होते हैं:

शारीरिक: रोग-निवारण, दीर्घायु, बल-वृद्धि
मानसिक: बुद्धि, विवेक, मन की शांति
सामाजिक: यश, सम्मान, कीर्ति
आध्यात्मिक: मोक्ष, सिद्धि, अनाहत चक्र जागृति

माँ कूष्मांडा की उपासना से अनाहत चक्र (हृदय चक्र) जागृत होता है जिससे साधक में दया, प्रेम, सहानुभूति और करुणा के भाव प्रबल होते हैं।

ज्योतिषीय एवं आध्यात्मिक महत्व

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार माँ कूष्मांडा सूर्य ग्रह की अधिष्ठात्री देवी हैं। जिनकी कुंडली में सूर्य दुर्बल हो या पितृदोष हो, उन्हें विशेष रूप से माँ कूष्मांडा की आराधना करनी चाहिए।

तंत्र-साधना में माँ कूष्मांडा का संबंध अनाहत चक्र (चतुर्थ चक्र) से है। इस चक्र के जागृत होने पर साधक को अलौकिक ऊर्जा और सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। साधक का मन निर्मल होकर दैवी शक्तियों की ओर उन्मुख हो जाता है।

नवरात्री के चौथे दिन हरे रंग के वस्त्र पहनना शुभ माना जाता है। यह रंग माँ की प्रकृति, जीवन-शक्ति और समृद्धि का प्रतीक है।

✦ जय माँ कूष्मांडा ✦

माँ कूष्मांडा की आरती

कूष्मांडा जय जग सुखदानी।
मुझ पर दया करो महारानी॥

पिंगला ज्वालामुखी निराली।
शाकंभरी माँ भोली भाली॥

लाखों नाम निराले तेरे।
भक्त कई मतवाले तेरे॥

भीमा देवी तू ही कहलाती।
सौम्य सुंदर नाम तू पाती॥

हर संकट को तू ही हटाती।
भक्त के दुख दूर करती माई॥

उपसंहार

माँ कूष्मांडा की पूजा हमें यह संदेश देती है कि ब्रह्मांड की समस्त शक्ति उसी एक दिव्य माँ में निहित है। जब हम श्रद्धा और भक्ति के साथ उनकी आराधना करते हैं, तो हमारे जीवन में उनकी ऊर्जा का प्रकाश फैल जाता है।

नवरात्री के इस पावन पर्व पर माँ कूष्मांडा की कृपा से आप सभी के जीवन में सुख, समृद्धि, स्वास्थ्य और शांति का आगमन हो — यही हमारी प्रार्थना है।

🙏 सर्वमंगलमांगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके। शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोस्तुते॥