नवरात्री के तीसरे दिन माँ दुर्गा के तृतीय स्वरूप “चंद्रघंटा” की पूजा की जाती है। यह स्वरूप शक्ति, साहस और करुणा का अद्भुत संगम है — जो अपने भक्तों के जीवन से समस्त कष्टों को हर लेती हैं। नवरात्री चौथा दिन माँ चंद्रघंटा-शौर्य वीरता और शांति की देवी
माँ चंद्रघंटा का स्वरूप
माँ चंद्रघंटा का यह नाम इसलिए पड़ा क्योंकि उनके मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र विराजमान है। यह चंद्र उनके तेज और पवित्रता का प्रतीक है।
दिव्य स्वरूप का वर्णन
माँ का शरीर सोने की तरह चमकीला है। उनके दस हाथ हैं जिनमें खड्ग, गदा, धनुष-बाण, कमल, कमंडल और त्रिशूल सुशोभित हैं। वे सिंह पर सवार हैं और उनका मुख सदैव युद्ध के लिए तैयार रहता है — परंतु उनके भक्तों के लिए वे सदा शांत और करुणामयी हैं।
पौराणिक कथा
पुराणों के अनुसार, जब माँ पार्वती ने भगवान शिव से विवाह का निश्चय किया, तो शिव जी बारात लेकर हिमालय के द्वार पर पहुँचे। उनके साथ भूत-प्रेत, अघोरी और विचित्र गण थे। यह दृश्य देखकर पार्वती की माता मेना देवी भय से मूर्च्छित हो गईं।
तब माँ पार्वती ने अपना रौद्र रूप त्याग कर चंद्रघंटा का दिव्य स्वरूप धारण किया। उनके माथे पर चमकता अर्धचंद्र, दसों हाथों में शस्त्र और सिंह पर आसीन — यह रूप इतना तेजस्वी था कि समस्त वातावरण प्रकाशमय हो गया। इसी रूप में उन्होंने शिव जी से विवाह किया।
“चंद्रघंटा की उपासना से साधक को इस लोक में और परलोक में भी कल्याण की प्राप्ति होती है। उनकी कृपा से साधक में शूरता, निर्भयता और विनम्रता एक साथ आती है।
पूजा विधि — तृतीया के दिन
इस दिन माँ चंद्रघंटा की पूजा ब्रह्ममुहूर्त में आरंभ करना शुभ माना जाता है। निम्न विधि से पूजा करें —
- प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ हरे वस्त्र धारण करें (हरा माँ का प्रिय रंग है)
- माँ की प्रतिमा या चित्र के सामने दीप और धूप प्रज्वलित करें
- चमेली के फूल, चंदन और हरी दूब अर्पित करें
- खीर या दूध से बनी मिठाई का भोग लगाएं
- दुर्गा सप्तशती के तृतीय अध्याय का पाठ करें
- माँ के मंत्र का 108 बार जप करें
- घंटा बजाते हुए आरती करें — माँ को घंटे की ध्वनि अत्यंत प्रिय है
पिण्डजप्रवरारूढ़ा चण्डकोपास्त्रकैर्युता।
प्रसादं तनुते मह्यं चन्द्रघण्टेति विश्रुता॥
माँ चंद्रघंटा की उपासना के लाभ
शास्त्रों में कहा गया है कि माँ चंद्रघंटा की सच्चे मन से की गई उपासना से अनेक लाभ होते हैं —
- जीवन में साहस और निर्भयता आती है — भय का नाश होता है
- मानसिक शांति और आत्मविश्वास में वृद्धि होती है
- शत्रुओं और बुरी शक्तियों का नाश होता है
- माँ के घंटे की ध्वनि मात्र से नकारात्मक ऊर्जाएं दूर भागती हैं
- मणिपुर चक्र सक्रिय होता है — जिससे व्यक्तित्व में तेज आता है
- भक्त के जीवन में सुख, समृद्धि और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है
ध्यान का स्वरूप — योग साधना
तंत्र शास्त्र के अनुसार माँ चंद्रघंटा का वास मणिपुर चक्र (नाभि केंद्र) में होता है। इस दिन ध्यान करते समय नाभि क्षेत्र पर ध्यान केंद्रित करना विशेष फलदायक है।
ध्यान विधि
सुखासन में बैठकर, आँखें बंद करके, माँ के सुनहरे स्वरूप का ध्यान करें। कल्पना करें कि माँ के माथे का चंद्र आपको श्वेत प्रकाश दे रहा है — यह प्रकाश आपके भीतर प्रवेश कर समस्त कलुष और भय को नष्ट कर रहा है। कम से कम 15-20 मिनट इस ध्यान में रहें।
इस दिन क्या करें, क्या न करें
हरे वस्त्र पहनें, व्रत रखें, घंटा बजाएं, दान करें, मंत्र जाप करें।
क्रोध न करें, मांस-मदिरा से दूर रहें, झूठ न बोलें, किसी को कष्ट न दें।