Motivational Story शिक्षा के असली मायने बच्चों को जरूर सिखाएं

Motivational Story शिक्षा के असली मायने बच्चों को जरूर सिखाएं

Motivational Story शिक्षा के असली मायने बच्चों को जरूर सिखाएं

 

आजकल हर मां बाप अपने बच्चे को हर तरह की सुख सुविधा देना चाहता है अच्छे से अच्छे और बड़े से बड़े स्कूल में पढ़ाना चाहता है दुनिया को दिखाना चाहता है कि देखो मेरे बच्चे कितने बड़े स्कूल में पढ़कर आ रहे हैं परंतु इन सब बातों के साथ-साथ जो बच्चों को नैतिक मूल्यों की जानकारी और संस्कारित करने की जो जानकारी है वह कहीं ना कहीं मां बाप के रूप में हम पीछे छोड़ जाते हैं तो एक कहानी के माध्यम से मैं यह समझाना चाहूंगी कि स्कूली शिक्षा के साथ-साथ बच्चों का नैतिक और बौद्धिक विकास कितना जरूरी है ताकि वह एक अच्छे इंसान के रूप में विकसित हो पाए

 

 

एक दंपत्ति के यहां एक के बाद एक चार लड़के हुए जब भी उसका लड़का होता तो वह हर बार कहती थी मैं अपने लड़के को गुरुकुल की शिक्षा जरूर दिलवा होगी उसे धर्म का ज्ञाता पंडित और योगी भी बनाऊंगी पर पति इसके विपरीत सोचता था और वह कहता था कि जो पंडित बन गया जोगी बन गया वह तो भूखा ही में रहेगा मैं तो अपने लड़कों को ऐसी शिक्षा दूंगा ताकि वह बड़े से बड़े अफसर बन जाए और कामयाबी पाकर दुनिया पर राज करें

 

 

तीन लड़कों के लिए पति ने सहमति नहीं दी उन्हें अपने हिसाब से पढ़ने भेजा अच्छे से अच्छे बड़े से बड़े स्कूल में डाला अच्छी से अच्छी शिक्षा उन्हें दी वहीं पत्नी चौक के लड़के के समय पर अड़ गई कि नहीं मैं इसे शिक्षा-दीक्षा अपने हिसाब से दूंगी समय आने पर बच्चे अपने पैरों पर मजबूती से खड़े हो गए जो पहले तीन लड़के थे उन्होंने बड़ी मेहनत करके बड़ी-बड़ी नौकरियां पाली

 

 

1 दिन पति ने पत्नी को ताना मारते हुए कहा देखो जिन तीन लड़कों को मैंने अपने हिसाब से शिक्षा दीक्षा दी थी वह तीनों और अच्छे पदों पर विराजमान हैं मुझे अब इनकी कोई चिंता नहीं है लेकिन जो चौथा बेटा है जिसको तुमने अपने हिसाब से शिक्षा दीक्षा दी है वह क्या कमाई करके अपना और अपने परिवार का पेट पाल लेगा तो पत्नी ने कहा कि इस बात का निर्णय आज शाम को हम करेंगे

 

 

शाम के समय पत्नी ने अपनी शारीरिक स्थिति ऐसी बना ली कि जैसे पति ने बहुत मारा पीटा है बहुत दुख दिया है और बच्चों के आने से पहले पति को बोल दिया कि आप कमरे के अंदर रहेंगे और आज पता लग जाएगा किस की शिक्षा दीक्षा अच्छी रही और किसकी बुरी रही पहले तीनों बेटे जब आए उन्होंने मां की हालत आंगन में देखी तो सबके अपने पिता के लिए बुरे वचन मुंह से निकले कि बुड्ढा है सठिया गया है अभी मैं सोने जा रहा हूं सुबह उठकर उनकी खबर लूंगा बुढ़ापे में अपनी औलाद से क्या जूते खाएंगे जो अपनी पत्नी को ऐसे मार रहे हैं यह वह तीन लड़के थे जिन की शिक्षा दीक्षा पति ने करवाई थी जिनको बहुत मान था

 

 

अब जब चौथा बेटा घर पर आता है तो वह मां को इस हालत में देखता है तो मां ने पति के लिए भले बुरे शब्द कहे तो बेटे ने कहा कि मां मैंने पिताजी को आज तक आप से बदतमीजी से बात करते हुए नहीं देखा तो आपके ऊपर हाथ कैसे उठा सकते हैं कहीं ना कहीं आप से भी गलती जरूर हुई होगी पिता जी आपका बहुत ख्याल रखते हैं इतने में पति कमरे से बाहर निकलता है और रोने लगता है की हम बच्चों को बड़े-बड़े स्कूलों में तो पढ़ा लेते हैं पर घर में मां-बाप से या भाई-बहन से या पारिवारिक रिश्तो को कैसे निभाना है इसकी शिक्षा दीक्षा बड़े स्कूलों में कहीं ना कहीं गायब हो जाती है बच्चों को आप बड़े स्कूलों में जरूर पढ़ाएं पर नैतिक मूल्यों की शिक्षा हमें घर से ही देनी होगी क्योंकि बच्चे हमारे हैं तो उनकी शिक्षा-दीक्षा किस तरह से होनी चाहिए यह निर्णय लेना भी हमारा ही कर्तव्य है सुख सुविधाएं बच्चों को जरूर उपलब्ध कराएं पर उन्हें अपनी जड़ों के साथ जरूर जोड़ कर रखें

 

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