सावन के महीने में जब धरती हरी चुनरी ओढ़ लेती है, आकाश में काले बादल घिर आते हैं और मन-मयूर नाचने लगता है, तब आता है हरियाली तीज का त्योहार। यह पर्व सावन मास की शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाया जाता है और विशेष रूप से उत्तर भारत — राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार, हरियाणा, मध्य प्रदेश — में बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। यह केवल एक धार्मिक पर्व ही नहीं, बल्कि प्रकृति के श्रृंगार, वैवाहिक सुख और स्त्री शक्ति के उत्सव का प्रतीक भी है। हरियाली तीज का महत्व: प्रकृति, प्रेम और आस्था का पावन पर्व
हरियाली तीज का पौराणिक महत्व
हरियाली तीज का सीधा संबंध भगवान शिव और माता पार्वती के मिलन से जुड़ा है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए 108 जन्मों तक कठोर तपस्या की थी। अंततः इसी तिथि को शिवजी ने माता पार्वती को पत्नी रूप में स्वीकार किया था। इसीलिए इस दिन को शिव-पार्वती के पुनर्मिलन के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है, और महिलाएं इस दिन व्रत रखकर अपने पति की दीर्घायु तथा सुखी वैवाहिक जीवन की कामना करती हैं।
अविवाहित कन्याएं भी इस व्रत को मनचाहे वर की प्राप्ति के लिए रखती हैं, यह मानते हुए कि माता पार्वती जैसी अटूट श्रद्धा और तपस्या से उन्हें भी एक आदर्श जीवनसाथी मिलेगा।
प्रकृति और मानसून से जुड़ाव
हरियाली तीज का नाम ही इसके प्रकृति-प्रेम को दर्शाता है। सावन के महीने में मानसून की पहली बारिश के बाद धरती पर जो हरियाली छा जाती है, यह पर्व उसी का उत्सव है। यह त्योहार हमें प्रकृति के साथ हमारे गहरे संबंध की याद दिलाता है — किसान इस मौसम में फसल बोते हैं, पेड़-पौधे नई कोंपलें फोड़ते हैं, और चारों ओर हरियाली की चादर बिछ जाती है। इसीलिए यह पर्व जीवन, उर्वरता और नवसृजन का प्रतीक भी माना जाता है।
व्रत और पूजा की परंपरा
हरियाली तीज पर महिलाएं निर्जला या फलाहारी व्रत रखती हैं। इस दिन की मुख्य परंपराओं में शामिल हैं:
- सोलह श्रृंगार: महिलाएं हरे रंग की साड़ी या सूट पहनती हैं, हाथों में मेहंदी रचाती हैं और पूरा सोलह श्रृंगार करती हैं। हरा रंग समृद्धि, प्रकृति और नई शुरुआत का प्रतीक है।
- शिव-पार्वती पूजन: घर या मंदिर में मिट्टी या बालू से बनी शिव-पार्वती की प्रतिमा स्थापित कर विधिवत पूजा की जाती है।
- झूला झूलना: पेड़ों पर सुंदर झूले डाले जाते हैं, और महिलाएं-लड़कियां मिलकर झूला झूलती हैं तथा तीज के पारंपरिक लोकगीत गाती हैं। यह परंपरा सावन की मस्ती और सामूहिक उल्लास का प्रतीक है।
- मेहंदी और श्रृंगार प्रतियोगिताएं: कई स्थानों पर महिलाएं एकत्र होकर मेहंदी लगाती हैं और पारंपरिक गीत-नृत्य का आनंद लेती हैं।
- मायके से सिंधारा: विवाहित बेटियों के मायके से “सिंधारा” भेजा जाता है, जिसमें मिठाई, कपड़े, चूड़ियां और श्रृंगार का सामान होता है — यह रिश्तों की मिठास और स्नेह को दर्शाता है।
सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व
हरियाली तीज केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि यह स्त्रियों के आपसी मेल-मिलाप, सामूहिकता और सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखने का माध्यम भी है। इस दिन महिलाएं अपने रोज़मर्रा के कामकाज से कुछ पल निकालकर अपनी सहेलियों, बहनों और रिश्तेदारों के साथ समय बिताती हैं। लोकगीत, कजरी, झूमर जैसे पारंपरिक गीत इस पर्व की आत्मा हैं, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होते आए हैं।
यह पर्व स्त्री शक्ति, धैर्य और आत्मनिर्भरता का भी प्रतीक है — माता पार्वती की तपस्या हमें सिखाती है कि दृढ़ संकल्प से किसी भी लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है।
विभिन्न राज्यों में हरियाली तीज
- राजस्थान: यहां हरियाली तीज सबसे भव्यता से मनाई जाती है। जयपुर में तीज माता की शाही सवारी निकाली जाती है, जो इस पर्व का प्रमुख आकर्षण है।
- उत्तर प्रदेश और बिहार: यहां व्रत, झूला और गीत-संगीत की परंपरा प्रमुख है, साथ ही मायके से सिंधारा भेजने की रीति निभाई जाती है।
- मध्य प्रदेश और हरियाणा: इन राज्यों में भी महिलाएं सामूहिक रूप से पूजा करती हैं और पारंपरिक पकवान बनाए जाते हैं, जिनमें घेवर मिठाई विशेष रूप से लोकप्रिय है।
निष्कर्ष
हरियाली तीज केवल एक व्रत या धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि यह प्रकृति के प्रति कृतज्ञता, वैवाहिक प्रेम की पवित्रता, स्त्रियों की सामूहिक ऊर्जा और भारतीय संस्कृति की समृद्ध परंपरा का जीवंत उदाहरण है। यह पर्व हमें सिखाता है कि जीवन में रिश्तों की मिठास बनाए रखना, प्रकृति का सम्मान करना और सामूहिकता में आनंद ढूंढना कितना महत्वपूर्ण है। सावन की बूंदों के साथ झूलते झूले और गूंजते लोकगीत हर साल इस पर्व को और भी खास बना देते हैं।