जाने क्या होता है कर्मो का फल – कर्म सिद्धांत के बारे में जाने

नमस्ते दोस्तों, आप सब का स्वागत है इस ब्लॉग में एक बार फिर से, आज का ये ब्लॉग जिसमे जाने क्या होता है कर्मो का फल – कर्म सिद्धांत के बारे में जाने, एक बात तो तय है की हमारे कर्म हमारे लिए कुछ ना कुछ संजोये रखते है, हम अच्छा करना चाहते है तो कर्म उसके अनुसार ही हमें फल देता है, अगर हमारे कर्म बुरे है तो बुरा फल हमें मिल ही जाता है.

हाँ, कर्म के फल के बारे आपको विस्तार से बताती हूँ 

कर्मों के फल की अवधारणा

कर्म शास्त्रों में यह सिद्धांत प्रमुख स्थान रखता है कि हर एक कर्म का कोई न कोई फल अवश्य मिलता है। यह फल कर्म की प्रकृति पर निर्भर करता है – अच्छे कर्मों का फल सुख और शांति है जबकि बुरे कर्मों का फल दुःख और पीड़ा। हिंदू धर्म में इसे “कर्म सिद्धांत” कहा जाता है।

कर्म के तीन भेद

1) संचित कर्म – जो हमारे पिछले जन्मों के कर्मों का संचय है।
2) प्रारब्ध कर्म – वर्तमान जन्म के लिए निर्धारित कर्म फल।
3) क्रियमाण कर्म – वर्तमान में किए जा रहे कर्म।

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कर्म का फल भोगना ही पड़ता है

गीता में कृष्ण कहते हैं – “कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः” अर्थात महान लोगों ने भी कर्म के फल भोगे हैं। इसलिए किसी भी कर्म के फल से बचना संभव नहीं है। जीव को इस जन्म में प्रारब्ध कर्मों का फल भोगना ही पड़ता है।

निष्काम कर्म का महत्व

गीता में निष्काम कर्म की शिक्षा दी गई है। निष्काम भाव से किए गए कर्म बंधन नहीं बनाते। ऐसे कर्म से कर्मबंधन से मुक्ति मिलती है। इसीलिए संन्यासी और साधक लोग निष्काम कर्म करते हैं ताकि वे कर्म बंधन से मुक्त हो सकें।

कर्म और पुनर्जन्म

अनेक धर्म शास्त्रों में यह मान्यता है कि जीवात्मा को उसके कर्मों के अनुसार ही जन्म लेना पड़ता है। अच्छे कर्मों के फलस्वरूप शुभ जन्म और बुरे कर्मों के कारण दुर्गति मिलती है। इस प्रकार कर्म और जन्म-मरण का चक्र चलता रहता है।

निष्कर्ष

इस प्रकार कर्म का फल मानव जीवन का एक महत्वपूर्ण पहलू है। धार्मिक और नैतिक शिक्षाओं के अनुसार यदि हम अपने कर्तव्यों का पालन करें और सदाचरण का जीवन व्यतीत करें तो हमें सुख, शांति और आनंद की प्राप्ति होगी। बुरे कर्मों से बचना ही जीवन का मूल लक्ष्य होना चाहिए।